Sunday, 7 August 2016

"ढाई आखर प्रेम" : काव्य-संग्रह




ययाति मदन जी गाँधी ग्रुप ऑफ़ पब्लिकेशन्स
का दूसरा काव्य संग्रह जल्द ही प्रकाशित हो रहा है
ढाई आखर प्रेम : काव्य-संग्रह
मुख्य- संपादक : डॉ० सुषमा गॉधी देवयानी
संपादक : जय कृष्ण शुक्ल...
प्रकाशक : द पोयट्री सोशायटी ऑफ इण्डिया, गुड़गॉव (हरियाणा)

सम्मिलित कवि
अनुक्रमणिका
नीहारिका-1
..........................................................................................................
श्री मदन मोहन पाण्डेय, कुशीनगर (उ.प्र.)
1 मैं तुम्हारा नाम नहीं लेता 1
2 एक बार फिर 2
3 रीता मन 3
4 तुम्हारा आना 4
5 आओ चलें 5
श्रीमती मंजुला वर्मा ठाकुर, सोलन (हि0प्र0)
1 मैं किताब बन गई हूँ 6
2 मैं रेत तेरी 7
3 मेरी पूर्णता 8
4 प्रेम 9
5 दूर देश में 10
श्री रंजन मंगोत्रा, मोहाली (चण्डीगढ़)
1 नमी का अहसास 11
2 आह 12
3 कैसे भूल जाऊँ 13
4 मेरे जज्बात 14
5 रेत पर सपने 15
श्रीमती अमिता गुप्ता, मोहाली (चण्डीगढ़)
1 मेरी डोली 16
2 भीगी दास्ताँ 17
3 विश्वास 18
4 तुम्हारा प्यार 19
5 प्यार का रिश्ता 20
श्री मुकेश प्रसाद, सिलीगुड़ी (प0बं0)
1 आरजू 21
2 कुछ वक्त 22
3 अधूरा कारवाँ 23
4 वो नज़्म 24
5 तेरा चेहरे का टिप्पा 25
श्री नमन कुमार मिश्रा, लखनऊ (उ0प्र0)
1 तुम्हारे दिल में 26
2 तेरे छू जाने से 27
3 कहानी 28
4 वो बीते लम्बे 29
5 जब हम तुम्हारे साथ थे 30
श्री निखिल पाण्डेय ’नादा’ मुम्बई (महाराष्ट्र)
1 डायरी बोलती है 31
2 निवेदन 32
3 शरारत 33
4 बेचैनी का रंग 34
श्री वीरेन्द्र जैन, नागपुर (महाराष्ट्र)
1 तुम्हारी याद 35
2 दिल और घर 36
3 आसरा 37
4 पाजेब 38
5 काश 39
श्रीमती अंकिता शाही, मुजफ्फरपुर (बिहार)
1 कैलेण्डर की तारीख 40
2 तुम्हारा इन्तजार 41
3 छुपा प्रेम 42
4 सिर्फ तुम्हारे लिये 43
5 गीत 44
सुश्री ज्योति आर्या, नई दिल्ली (दिल्ली)
1 अच्छा लगता है 45
2 बीमारी 46
3 टोकरियाँ 47
4 मेरा आज 48
5 मुझे वक्त ही कितना लगेगा 49

गीतिका
..........................................................................................................
श्रीमती निशा राय, गोरखपुर (उ0प्र0)
1 प्रेम लिख जायें 53
2 मुझे कविता ही रहने दो 54
3 कुछ तुम करीब आओ कुछ हम करीब आयें 55
4 बिखरी हुई सी जिन्दगी इसको सँवार दो 56
5 आ जा मेरे पथिक बाहों में सुला लू मैं 57
श्री अभि शर्मा, विलासपुर (छततीसगढ़)
1 गजल: एक 58
2 गजल: दो 59
3 गजल: तीन 60
4 गजल: चार 61
5 गजल: पाँच 62
सुश्री सौम्या झा, जोधपुर (राजस्थान)
1 गजल: एक 63
2 गजल: दो 64
3 गजल: तीन 65
4 गजल: चार 66
5 गजल: पाँच 67
श्रीमती पूनम शर्मा अवस्थी, जयपुर (राजस्थान)
1 तुमको मेरी याद तो आती होगी 68
2 पावन बड़ी ये प्रीत है 69
3 कोई खजाना मिल गया 70
4 दिल हमें बच्चा नहीं लगता 71
5 डर अच्छा नहीं लगता 72
श्रीमती रूपिन्दर बरार, मोहाली (पंजाब)
1 आजमाइश 73
2 गीत: बात इतनी सी होती 75
3 मेरा अस्तित्व 76
डा. सोनिया गुप्ता, डेराबस्सी (पंजाब)
1 प्यार हमको भी जताना आ गया 77
2 दाने तुम्हारे नाम के बोई 78
3 देखो न भूल जाना 79
4 प्रियतम संग हमारा हो 80
5 एक अजनबी था 81
श्रीमती ओशो प्रिया, नई दिल्ली (दिल्ली)
1 मैं आज तुम्हारा प्यार बनीं 82
2 जब प्रेम तो कैसी जिज्ञासा 84
3 फिर आज मिले 85
4 इक प्रीतम के आ जाने से 86
5 प्रथम प्रेम की छुअन 87

श्री त्रिभुवन कौल, मुंबई (महाराष्ट्र)

1 आती है ललाई चेहरे पर 88
2 रात्रि के मध्य में 89
3 बैठे हैं दूर तुमसे 90
4 याद 91
5 चाँ सा मुखड़ा तुम्हारा 93


श्रीमती श्वेता प्रसाद सिन्हा, नई दिल्ली (दिल्ली)
1 प्रिय आओगे न, तुम्हें बुलाउँगी 94
2 जग में प्रिय, मेरे हो लेना 96
3 ना नयन जगे, ना नीर बहे 98
श्री अजय जैरथ, गुड़गाँव (हरियाणा)
1 चल जिन्दगी 99
2 खेजता है दिल सहारे 100
3 जब हवा का झोंका आये 101
राहुल रीत्विक, लखीसराय (बिहार)
1 मन कहता है 102
2 एक गुजारिश 103
3 तेरी बातें 104

नीहारिका-2
..........................................................................................................
श्री अनुराग खजूरिया, किंग्स्टन जमैका (वेस्टइंडीज)
1 तलाश 107
2 तेरा ख़त 109
3 बातों-बातों में 110
4 बांसुरी 111
5 इंतजार 113
श्रीमती अपर्णा झा, फरीदाबाद (हरियाणा)
1 दरवेश 114
2 कभी यूँ भी होता 115
3 एक सूरत 116
4 हिचकियाँ 117
5 सुपुर्द-ए-खाक 118
श्री राजेश्वर शर्मा, देहरादून (उत्तराखण्ड)
1 मुहब्बत 119
2 तुम्हारे दिन 120
3 तुम्हारी बेवफाई 121
4 मैं प्रेम हूँ 122
5 एक नदी हूँ मैं 123
श्री प्रकाश यादव ’निर्भीक, बड़ौदा (गुजरात)
1 प्रेम-शिखा 124
2 तुम्हारी बेरुखी 126
3 तुमसे दूर 127
4 गुमशुदा 128
5 गलतफहमी 130
श्री मनोज नेगी, देहरादून (उत्तराखण्ड)
1 खुशी और डर 132
2 वो आँखें तुम्हारी 133
3 तुम्हारी स्मृतियाँ 134
4 तुम्हारे आँसुओं में 135
5 अधूरी कविता 136
डा. चन्द्र प्रकाश शर्मा, पटियाला (पंजाब)
1 मैं इश्क हूँ 137
2 प्रेम में क्या है 139
3 प्यार कभी बूढ़ा नहीं होता 140
4 विचित्र प्रेम 141
5 प्रेम की महिमा 142
श्रीमती सतबीर चड्ढा, नई दिल्ली (दिल्ली)
1 प्रेम करना अगर आता 143
2 ये आँखें 145
3 मैं आगे जा रही हूँ - एक 146
4 दो 147
5 तीन 148
6 चार 149
श्री हरदीप सब्बसवाल, पटियाला (पंजाब)
1 छींक 150
2 स्मृतियां तुम्हारी 151
3 अभिलाषा 152
4 तुम और मैं 153
5 प्यार 154
श्री एम.ए. राठौर, हनुमानगंज (राजस्थान)
1 अदृश्य चिंता 155
2 तुम्हारा चिरन्तन अहसास 156
3 डरावने सपने 157
4 वियोग 158
5 बिछुरन 159

पं. नरेन्द्र शर्मा, अमृतसर (पंजाब)
1 हादसा 161
2 आओ घरोंदे बनाए 163
3 रास्ते 164
4 मृगतृष्णा 165
5 मानव-स्वभाव 167
प्रियांशु शेखर, नई दिल्ली (दिल्ली)
1 टूटे दरख्तों से पूछो 168
2 हाय तेरी आँखे 170
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Thursday, 4 August 2016

मनुष्य इतना गिर सकता है !

मनुष्य इतना गिर सकता है !
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जुलाई २०१६ अंत में बुल्लन्दशहर (यूपी) एन एच १९ हुई माँ- बेटी के साथ हुए दर्दनाक़ और अमानवीय बलात्कार की घटना ने एक बार फिर याद दिल दिया कि निर्भया काण्ड की (१६ दिसम्बर २०१२) की याद तो दिलI ही दी साथ में यह भी भास करा दिया कि तब से अब तक कुछ भी नहीं बदला है।  

मनुष्य इतना गिर सकता है कभी कल्पना भी नहीं की थी...लचर क़ानून और मानव अधिकार वाले (जिसमे स्त्रियां भी सम्मिलित हैं ) तो आड़े आते ही हैं , २१वी शताब्दी का मनुष्य अमानुष होता जा रहा है.. समस्या यह है की कोई ठोस कदम उठाने को कोई तैयार ही नहीं है... जन आंदोलन चाहिए जन आंदोलन.. एक ऐसी व् व्यवस्था जो स्त्रियों के प्रति अमानवीय व्यवहार के लिए पकडे जाने पर सीधा सीधा मृत्यु दंड दे दिया जाना चाहिए। 


नारी की दशा २१वीं शताब्दी में दलितों से भी गयी गुज़री है।  इस देश में , अल्पसंख्कों की , दलितों की, चलिए , वोटों की खातिर ही सही, कम से कम राजनीति के गलियारों से ,मीडिया के आलमदारों से आवाज़ तो उठती है। पर नारी जाती पर दिन पर दिन हो रहे अनाचार, अत्याचार पर बहस और सिर्फ बहस का ही विषय है।  एक कामी के सामने नारी जाती का ना कोई धर्म है, ना जाती,ना  भाषा ,ना आयु , ना देश, ना ही भेष। बस  नारी उसके सामने तो उसका शिकार है।देवी नहीं।

नारी सशक्तीकरण  ने अज्ञान, प्रताडित  और लाचार जीवन जीने को मजबूर  नारी जाती को केवल वास्तुस्तिथि से बस अवगत कराया है ना कि  उनका वास्तविक सशक्तीकरण।  नारी सशक्तिकरण के  मामूली प्रतिशत को अगर हम सम्पूर्ण नारी उद्धार गाथा मान लें तो हम बहुत बड़ी भूल कर रहें हैं। और आप ही बताये की नारी सशक्तिकरण कहाँ तक नारी जाती को  इस बर्बरता से , दुराचारों से , अत्याचारों से बचा पा रही है।  एक दोषी के लिए, एक अपराधी के लिए  नारी नारी ही है चाहे वः अशक्त है या सशक्त , एक  कामुक चाह को पूर्ण करने का जरिया। अब नारी चाहे राजा जो या रंक। नारी से संग अमानवीय ढंग  से व्यवहार करने वालों में जहाँ   एक तरफ बड़े घरों के लोग शामिल हैं तो दूसरी तरफ दुसरे तबके के लोग। चाहे कारण राजनितिक हों या सामजिक। अंततः  भुगतना तो नारी को ही पड़ रहा है।
====================================त्रिभवन कौल



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Wednesday, 3 August 2016

My article in Business Sandesh Issue July 2016




Dear Friends
Greetings

My article, DO NOTHING AND ENJOY,  has been published in the July 2016 issue of Business Sandesh. You are cordially invited to read and enjoy. Simply click on the link or copy paste the link on your browser's address bar.

http://www.businesssandesh.in/do-nothing-and-enjoy/

Thanks
Tribhawan Kaul
03-08-2016

Tuesday, 2 August 2016

An Overview :-“Wings of Rhapsody- A Dalliance of Poems”


An Overview :-“Wings of Rhapsody- A Dalliance of Poems”
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“My poems are expressions of wonder, an appreciation of nature in her myriad colours , and forms and motivational introspections and human and nature events occurring around us silently which we typically tend to miss in our self absorbed fast lives.” Seema K Jayaraman .

While going through the poems composed in “Wings of Rhapsody- A Dalliance of Poems” by Seema K Jayaraman, I could not but appreciate the apt summarisation of subjects dealt with, in her above quote. The thoughts weaved in verses are only an extension of her ideas, notions, beliefs, concepts, opinions, impressions and  images which seems to have been amassed slowly and gradually within her sharp intellect only to flourish through this poetic treatise bordering elegance and charm like an established poetess. In section ‘Pangs of Birthing a Poem’ the poetess dwells on this aspect in detail.

To spell out the self-locked inside
A stray spark flies, to light
Looking to kindle a flare inside
Stir a bonfire within vaults
Of long emptied imagination.  (Embers of creativity)

The poems are basically an outpouring of a person who is very sensitive to the happening around her, wishes to introspect, sees the nature as its best and tries to analyse love & passion. Her poems find solace in photogenic beauty of the nature. Poems like ‘All Trussed Up’ ‘Rape of an innocence’ shows her immense pain. ‘My Baby’ brings alive a newborn’s innocent but mind blowing image.  Her poems talk of penguin, bulbuls, parrots on one hand and then shifts gear to soak us in ‘Dawn’ ‘Monsoon’ and ‘ Powai Lake’ through her brilliant verses.
Her short poems plus haikus/senryus take the cake which spreads before us a buffet of emotions, an exhilarating imagery combined with intuitive understanding of human nature and nature’s grace.

Though the poetess seems to be casual in her approach sometimes yet her enthusiastic expression of feelings will bring her readers to feel her subtle thoughts with vivid poetic imagery through her beautiful, soothing, soulful poems and lovely haikus/Senryus.

Seema K Jayaraman herself admits that she is an ‘ Accidental Poet’ and let her be so as even if she is the one, readers will lap her every word from her imaginative acumen.

Deciphering outpourings, daylight reality
Laid out for the world, a modern art of words
Strung together for the sense, prose too miserly
I agreed to rearrange the words, a canvass of poems
Thus was born a poetess-albeit so accidentally.   (An Accidental Poet)

 With “Wings of Rhapsody- A Dalliance of Poems”
 I am sure, Seema K Jayaraman has already made inroads into the realms of literary world. My good wishes to her and to her eloquent poetry.

Tribhawan Kaul
Freelance writer-poet/India
02-08-2016
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Book Title :-Wings of Rhapsody- A Dalliance of Poems
Publisher :- Become Shakespeare.com
Price :- Rs.350/= $14.99

शहीद Shaheed


शहीद                                                 Shaheed
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ज़िन्दगी माँ तेरे करम का नूर है-------Zindgi maa tere karam ka nor hai              
तिरंगे में लिपटा शहीद कोहेनूर है.........Tirange mein lipta shaheed kohenoor hai
आज भी मिलेंगें जैचंद दस हज़ार..........Aaaj bhi milenge Jaichand dus hazaar
नापाक आज इसीलिए मगरूर है..........Napaak aaj isiliye magroor hai .

खून से जिसने लिखी इबादत, दूर है.......Khoon se jisne likhi ibadat, door hai  
है नहीं बीच अपने, मगर मशहूर है .......hai nahi beech apne, magar mashroor hai
क्या बनाएंगे स्मारक दोस्त उसका.........kya banayenge smaarak dost uska
धड़कनो में बसा, जो शूर है....................dhadkano mein basa, jo shoor hai.

देश पर मर मिटने का सरूर है..............desh pr mr mitne kaa saroor hai  
माँ तेरा ही क्या सबका गरूर है..............maa tera hee kya sabka garoor hai
उसने सिखाया उलझना सांपों से.............usne sikhaaya ulajhna saampon se
लाम पर जाएँ बस यह फितूर है...............lam pr jaaye bus yah fitoor hai.

नाव में छेद साहिल मजबूर है...................naav mein chedh saahil mazboor hai
घाटी के हालात ,किसका कसूर है...........ghaati ke haalaat, kiska kasoor hai
मरते बेगुनाह ,जांबाज़ हों शहीद..............marte begunaah, jaabanz hon shaheed
पाक धरा पर उभरा नासूर है....................Pak dhara pr ubhra ek naasoor hai.

है गवाह इतिहास और दस्तूर है................hai gavah itihaas aur dastoor hai
हुआ है वह फ़ना जो मगरूर है.................hua hai vh fana jo magroor hai
आतंकियों दिन तुम्हारे आ गए...................aatankiyon din tumahre aa gaye  

खात्मा ख़ुदा को भी अब मंज़ूर है...............khaatma khuda ko bhi ab manzoor hai.
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सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल


शहीद
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ज़िन्दगी माँ तेरे करम का नूर है
कफ़न में लिपटा शहीद कोहेनूर है
आज भी मिलेंगें जैचंद दस हज़ार
नापाक आज इसीलिए मगरूर है

खून से जिसने लिखी इबादत, दूर है 
है नहीं बीच अपने, मगर मशहूर है 
क्या बनाएंगे स्मारक दोस्त उसका
धड़कनो में बसा, जो शूर है

देश पर मर मिटने का सरूर है 
माँ तेरा ही क्या सबका गरूर है
उसने सिखाया उलझना सांपों से
लाम पर जाएँ बस यह फितूर है

नाव में छेद साहिल मजबूर है
घाटी के हालात ,किसका कसूर है
मरते बेगुनाह ,जांबाज़ हों शहीद
पाक धरा पर उभरा नासूर है

है गवाह इतिहास और दस्तूर है
हुआ है वह फ़ना जो मगरूर है
आतंकियों दिन तुम्हारे आ गए 
खात्मा ख़ुदा को भी अब मंज़ूर है
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सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल





picture curtsy Google images.com  (Pathankot martyr NSG Commodo Lt. Col. Nirajan Kumar)

Monday, 1 August 2016

एक रपट

एक रपट
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जलवृष्टि भी जो ना रोक पाया उन काव्य साधकों को क्या कहिये
किया सराबोर काव्य सुधा से उन काव्य साधकों को क्या कहिये
किसी ने पिलाई रूप सुधा किसी ने कविता को बस  प्यार किया
दीवानगी जिनपर छायी रज रज उन काव्य साधकों को क्या कहिये
------------------------------------------------.त्रिभवन कौल। 

मूसलाधार बारिश होते हुए भी , जगह जगह लम्बे जाम होते हुए भी यदि काव्य रस  बरसाने वाले कविगण एक फासला  तय कर किसी काव्य गोष्ठी में पहुँच कर अपनी कविताओं से कुछ ही सही पर सभी उपस्तिथ सम्मानीय कवियों को नहला दें तो में समझता हूँ की उस काव्य गोष्ठी का सफल होना तय है. डॉ, विनोद कुमार भल्ला जी की अध्यक्षता में हुई युवा उत्कर्ष साहित्यक मंच के तत्वधान में कल यानि कि ३१ जुलाई २०१६ को सांय ३ बजे से साढ़े ६ बजे तक काव्य गोष्टी को अंजाम दिया गया। 
गोष्टी में डॉ. भल्ला जी के अतिरिक्त सर्वश्री त्रिभवन कौल, देओ नारायण शर्मा  जी, राजकिशोर मिश्र जी, विजय मिश्र जी, अंकित तिवारी जी ,ईशान तनेजा जी, सुश्री अंजना मिश्र जी ऐवम सुश्री संतोष बजाज जी की उपस्तिथि माँ सरस्वती का आशीर्वाद ही सिद्ध हुई।

यद्यपि  आदरणीय लव कुमार प्रणय जी की,(नवी मुम्बई), श्री अरुण वर्मा जी (भिवंडी/महाराष्ट्र) सुश्री दीप्ति जी (पवई ) एवं पूना से आने वाले कविगणों को भयंकर जलवृष्टि ने हमें उनके सानिध्य से  वंचित रखा ,उनकी कमी खली पर जो भरपूर काव्य पाठ का अवसर सबको मिला, उस कमी की भरपूर भरपाई हो गयी.   

डॉ. भल्ला जी के नव रचित आने वाले संग्रह ' रूप सुधा ' से कुछ प्यारी प्यारी पंक्तियाँ :-
पथिक :-
फैला कर  झोली प्यार की
आया हूँ में द्वार तेरे 
जन्म जन्म की प्यास लिए
आया हूँ में घाट तेरे
पनिहारिन :-
मैं हूँ एक पनिहारिन
मैं जल पिलाती आयी हूँ 
जल के प्यासे पथिको की
मैं प्यास बुझाती आयी हूँ.
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आदरणीय देओ नारायण शर्मा जी की कविता ' प्यार कर लूँ तुमको कविता ' :-

यह जीवन उपवन कितना अंधकारमय
यह पुष्प अनुराग कितना विकलमय
यह पत्र दक्ष आस  कितना संकितमय
यह मग्न कपोल कितना रंजितमय
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सुश्री अंजना मिश्र जी की ' संघर्ष ही है जिंदगी '
संघर्ष ही है जिंदगी
संघर्ष ही है जिंदगी 
कभी कभी संघर्ष अपनों से
कभी परायों से है जिंदगी
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श्री विजय मिश्र जी के मुक्तक :-
गम के आंसुओं में मैंने रातें गुज़ार दी
यादों से सायों में मैंने शामें गुज़ार दी
लब खामोश हैं कुछ कहते क्यों नहीं
सुनने की आस में एक उम्र गुज़ार दी
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श्री राजकिशोर जी के मुक्तक :-
नहीं मज़दूर यदि होते इमारत भी नहीं होती  
नहीं मशहूर तुम होते इबादत भी नहीं होती
जहां का दौर तुम देखो पसीने भी उन्ही के हैं 
अगर मज़दूर नहीं होते शराफत भी नहीं होती
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श्री अंकित तिवारी ( एक नवांकुर) जी की 'शहर '
ढका ढका सा आसमान
झुकी झुकी दीवारें 
दबी दबी सी जिंदगी  
थमी थमी सी साँसे।
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 ऐवम इस काव्य गोत्ष्ठी की आयोजक (त्रिभवन कौल) की कविता ' शहीद ' जैसे रचनाओं ने जैसे मन ही मोह लिया। इसके अतिरिक्त अन्य रचनाओं में व्याप्त  हास्य -व्यंग, मार्मिकता, रोष, देश -प्रेम की भावनाओं से ओत -प्रोत रचनाओं मन लुभावनी रहीं और खूब तालियां बटोरती रहीं.  उन अविस्मरणीय पलों की कुछ झलकें आपके सामने पेश हैं।   सादर। 

जिंदगी माँ तेरे करम का नूर है
कफ़न में लिपटा शहीद कोहेनूर है
आज भी जयचंद मिलेंगे दस हज़ार,
वजह से जिनकी पाक मगरूर है............ ' शहीद '
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त्रिभवन कौल

01-08-2016