कवि की पत्नी
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एक बार जाने क्या सूझी
पत्नी को जो पास बुलाया
बड़े प्यार से बड़े प्रेम से
गम्भीर हो यह समझाया …1
"हे देवी, हे मुन्ने की जननी !
सुनो ध्यान से मेरी संगनी
कवि मैं हूँ तुम कविता मेरी
मैं कलाकार, तुम प्रेरणा मेरी..2
तुम चाँद तो सूरज मैं हूँ,
तुम गुलाब तो पंकज मैं हूँ
तुम शबनम तो पत्ता मैं हूँ,
तुम मोरनी तो सावन मैं हूँ….3
तुम माटी की सुंदर मूरत सी
मैं कुम्हार का एक खिलौना
तुम चादर मखमल सरीखी
मैं नर्म नर्म एक बिछौना……..4
मैं साइकिल का हूँ एक पहिया
तुम उसकी चमकीली तारें
तुम आसमान की चंचल बिजली
मुझ सरीखे बादल कारे ………… 5
तुम ईश्वर का एक करिश्मा
मैं कुदरत का एक नमूना
मैं पर्वत तो तुम गिरता झरना
तुम कुची तो मैं हूँ चूना …………….6
मैं लोकी तो तुम हो कद्दू
तुम बुद्धिमान और मैं बुद्दू
तुम नारंगी , संतरा मैं हूँ
तुम गीत तो अंतरा मैं हूँ………………..7
तुम डार-डार
मैं पात -पात
तुम आगे आगे
मैं साथ साथ …………………………….8
यह प्रलाप सुन वह घबराई
मांग के थर्मामीटर लाई
हे भगवान, यह क्या हो गया ?
दिमाग पति का किधर खो गया ?.....9
क्या तुम कुछ बौरा गए हो ?
या कुछ खा चकरा गए हो
अच्छा मैं मैके नहीं जाती
ठीक हो जाओ मेरे साथी………………..10
पागलपने की छोड़ो बातें
आओ हिलमिल काटे रातें
लोग कंहे तुम कवि बने हो
मैं कहती पागल हुए हो………………..11
यह सुन दिल मेरा जला
इच्छाओं पर पानी पड़ा
पहली कविता थी यह भाई
तभी समझ मैं बात यह आई
क्यूँ कविगण पत्नी से भागे
पोथा ले एकांत को साधे
कवि की पत्नी विपदा होती है ?
असली पत्नी कविता होती है………….. इति
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